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Thursday, March 9, 2017

सामनेवाली खिड़की

सामनेवाली खिड़की

मैं अक्सर अपनी गैलेरी में बैठा करता था.
फूल, बाग़, वृक्ष देखा करता था.
सामने दो-मंजिला मकान था, बिलकुल सामने
उनकी गैलरी भी सामने ही पड़ती थी.
फुल, बाग़. वृक्ष से होती हुई हवा मुझे शुकून देती थी
मैं घंटो वहां बैठा करता था...
एक दिन
सामने की खिड़की खुली
थोड़ी देर एक टक से देखता रहा
धडाम से खिड़की बंद होने की आवाज आई....
अक्सर ऐसा होने लगा...
अब तो जैसे ही मेरा दरवाजा खुलता, मैं चेयर पर बैठता, न बैठता
धडाम से खिड़की बंद होने की आवाज आती.
यह आवाज दिन-ब-दिन बढती जा रही थी...
धड़ाम की आवाज से अब पंची भी थरथर्राते...
एक दिन
जब मैं गैलरी में आया, बैठा
पर कोई आवाज नहीं...
वक्त जैसे सुन्न सा पड़ा रह गया...
मद्धिम सी हवा के जोंको में खिड़की खुली हुई थी
रौशनी से खिड़की जगमगा रही थी....
कोई थी वहां, उनके बाल हवा से जैसे गुफ्तगू रहे थे,
मैंने देखा, देखते ही रह गया
और
मैं उठा, मुड के मैंने अपना दरवाजा ज़ोर से बंद कर दिया
धड़ाम.....

-
Haresh Parmar

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