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Thursday, March 9, 2017

फटी हुई चादर

फटी हुई 
चादर

ठण्ड रात थी
उनकी चादर फटी हुई थी,
चादर कंप कंपा रही थी,
कभी इधर-कभी उधर लुढ़क रही थी.
बस सिर्फ चादर फटी हुई थी,
गहरी अँधेरी रात थी,
ठण्ड उससे भी ज्यादा ढीठ थी....
रात जितनी लंबी थी, उससे भी ज्यादा लंबी हो रही थी
चादर फटी हुई थी...
नींद आँखों में होते हुए भी
ठंडे तारों को देख रही थी...
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Haresh Parmar 

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