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Thursday, March 9, 2017

मुरझाते फूल

मुरझाते फूल

आपके स्वर्ग हमें नहीं चाहिए
हमें डरना भी नहीं है आपके उस नर्क से
हम छोटे छोटे सपनों लिए आसमान के नीचे
तरोभरी रात में सोनेवाले है...
हा... डर होता है, फुटपाथों पर, बाग़ो-खलिहानों में
मगर जब चांदनी होती है तो मौत का डर कही ओर होता है |
सूरज की रौशनी में जैसे सहज ही फूल खिलते है ...
भूख से तडपे हमारे पेट में
कुछ रोटी मिल जाये, हम फूलों की तरह खिल उठते है |
हमारी ख़ुशी आपकी ख़ुशी से बहुत छोटी है
अहसास है हमें
यह अहसास तब भी होता है
जब हमारे हाथ में आपकी ही तरह रोटी होती है
पर ख़ुशी आपके चेहरे पर नहीं होती
तब हम साम के ढलते सूरज में मुरझाते फूल की तरह कुम्हलाते रहते है
आप चांदनी से नहाई धरती, तारोभरी रात नहीं देख पाते
हमारे अहसास को क्या आप देखोगें ?
हम छोटी खुशियों में खिलते है
हम उन्ही अहसासों से मुरझा जाते है |
- हरेश परमार

मशाल बुझी हुई है ..

मशाल बुझी हुई है ....

कोई फूल मुरझाये
आपको क्या ?
कोई पत्थर पर चढ़ जाए 
आपको क्या ?
क्या कोई इंसान भी जिन्दा है यहाँ
चाँद पर जाने से जैसे
चाँद भी पत्थर हो गया ...
चांदनी हो गई उजाला ...
माफ़ करना मेरे दोस्त !
यहाँ पर कोई तुम्हारी उम्मीद सुनने नहीं आये है
सपने तो ‘पाश’ के समय में भी मरते थे
आज सपनों के साथ इन्सान भी मरता है
पर मशाल मेरी बुझी हुई है ....
-
हरेश परमार

वक्त हमसफ़र है

वक्त बहुत बेवफा होता है
जब कोई होता है पास में
वह दौड़ने लगता है
और जब हम तनहा होते है
उस तन्हाई में वक्त ही साथ होता है...
तन्हाई का सफ़र वक्त के साथ बहुत लम्बा होता है....
वक्त से रहम नहीं, मरहम नहीं...
वक्त हमसफ़र है... और साथी है तन्हाई, इंतजार और
गम को सुनती हुई सुनी दीवारे...
-
हरेश परमार

Wednesday, September 14, 2016

क्रांति का नारा : जय भीम का नारा

'वंचित जनता' में प्रकाशित आलेख आपके सामने प्रस्तुत है 
धन्यवाद

Wednesday, December 9, 2015

Apni Parchhai

अपनी परछाई


कभी जिन्दगी की साम ढलने के वक्त 

कुछ अहसास होता है अँधेरे का
कुछ सुकून सा देता है 
वह पल चहचहाते उड़ते अपने घर को लौटते पंख
कुछ शांत से खड़े, पत्तो को संजोयें पेड़
कुछ वक्त के लिए होता है अहसास
अँधेरा घना होने से पहले
सूरज के डूबने के बाद
कुछ लालिमा आसमान की
देती है सुकून
फिर बढ़ता है अँधेरा
हमें दिखाई देती है परछाई
परछाई बढती है
आगोश में लेती है हमें अपनी ही परछाई
और खो जाता है इन्सान
अपने अंधेरें में....
-
हरेश परमार

Tuesday, October 13, 2015

ख़ामोश गलियारें


ख़ामोश गलियारें

ख़ामोश गलियारों में 
अपने अंदर कई चींखे लिए हुए 
ख़ामोशी से 
अंधेरे देखते रहते है ....
कोई तमाशा नहीं है
कोई शोर नहीं है
सब ठीक है
बस यह साँसे चलती रहे 
अपने लिए ही सही
नहीं तो किसी की 
गुलामी के लिए ...
ख़ामोश गलियारों में 
चुपके से
बस
कई चीखे दफ़न हो जाती है ....
-
हरेश परमार

Friday, May 22, 2015

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https://openlibrary.org/authors/OL7238336A/Haresh_Parmar