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Thursday, March 9, 2017

देशभक्ति गीत

मेढक को जब मैंने कहा
प्यार की भाषा बोलो
उसने कहा 
‘ड्राऊ....’
मैंने उसे फिर कहा 
नफरत की भाषा बोल के दिखाओ
उसने कहा
‘ड्राऊ....’
मैंने उसे फिर कहा
चलो कोई नही, देशभक्ति गीत ही सुना दो
‘ड्राऊ....’
‘ड्राऊ....’
‘ड्राऊ....’

आरक्षण और प्याज

आरक्षण और प्याज

आरक्षण ?
यह क्या है ?
यह एक प्याज है, 
जो दिनोंदिन अपनी महत्ता बहधा रही है....
जब वह बिकती थी आम भावो में
बाजारों में
तब उसको कोई पूछता भी नहीं था,
तब वह गरीबों की कस्तूरी थी,
कुछ ना मिला दिन-दहाड़ी में
तो सूखी रोटी के साथ प्याज खा लेते ते थे
आज प्याज ने रुला दिया सब को
अच्छे दिन किसके है
दिखा दिया सब को
आज प्याज प्रासंगिक है
आरक्षण उतना ही
मूल्यवान एवं प्रासंगिक है....
आप प्याज को नकार नहीं सकते
तो फिर आरक्षण को क्यों नकार ?.....
-
हरेश परमार

फटी हुई चादर

फटी हुई 
चादर

ठण्ड रात थी
उनकी चादर फटी हुई थी,
चादर कंप कंपा रही थी,
कभी इधर-कभी उधर लुढ़क रही थी.
बस सिर्फ चादर फटी हुई थी,
गहरी अँधेरी रात थी,
ठण्ड उससे भी ज्यादा ढीठ थी....
रात जितनी लंबी थी, उससे भी ज्यादा लंबी हो रही थी
चादर फटी हुई थी...
नींद आँखों में होते हुए भी
ठंडे तारों को देख रही थी...
 -
Haresh Parmar 

सामनेवाली खिड़की

सामनेवाली खिड़की

मैं अक्सर अपनी गैलेरी में बैठा करता था.
फूल, बाग़, वृक्ष देखा करता था.
सामने दो-मंजिला मकान था, बिलकुल सामने
उनकी गैलरी भी सामने ही पड़ती थी.
फुल, बाग़. वृक्ष से होती हुई हवा मुझे शुकून देती थी
मैं घंटो वहां बैठा करता था...
एक दिन
सामने की खिड़की खुली
थोड़ी देर एक टक से देखता रहा
धडाम से खिड़की बंद होने की आवाज आई....
अक्सर ऐसा होने लगा...
अब तो जैसे ही मेरा दरवाजा खुलता, मैं चेयर पर बैठता, न बैठता
धडाम से खिड़की बंद होने की आवाज आती.
यह आवाज दिन-ब-दिन बढती जा रही थी...
धड़ाम की आवाज से अब पंची भी थरथर्राते...
एक दिन
जब मैं गैलरी में आया, बैठा
पर कोई आवाज नहीं...
वक्त जैसे सुन्न सा पड़ा रह गया...
मद्धिम सी हवा के जोंको में खिड़की खुली हुई थी
रौशनी से खिड़की जगमगा रही थी....
कोई थी वहां, उनके बाल हवा से जैसे गुफ्तगू रहे थे,
मैंने देखा, देखते ही रह गया
और
मैं उठा, मुड के मैंने अपना दरवाजा ज़ोर से बंद कर दिया
धड़ाम.....

-
Haresh Parmar

मुरझाते फूल

मुरझाते फूल

आपके स्वर्ग हमें नहीं चाहिए
हमें डरना भी नहीं है आपके उस नर्क से
हम छोटे छोटे सपनों लिए आसमान के नीचे
तरोभरी रात में सोनेवाले है...
हा... डर होता है, फुटपाथों पर, बाग़ो-खलिहानों में
मगर जब चांदनी होती है तो मौत का डर कही ओर होता है |
सूरज की रौशनी में जैसे सहज ही फूल खिलते है ...
भूख से तडपे हमारे पेट में
कुछ रोटी मिल जाये, हम फूलों की तरह खिल उठते है |
हमारी ख़ुशी आपकी ख़ुशी से बहुत छोटी है
अहसास है हमें
यह अहसास तब भी होता है
जब हमारे हाथ में आपकी ही तरह रोटी होती है
पर ख़ुशी आपके चेहरे पर नहीं होती
तब हम साम के ढलते सूरज में मुरझाते फूल की तरह कुम्हलाते रहते है
आप चांदनी से नहाई धरती, तारोभरी रात नहीं देख पाते
हमारे अहसास को क्या आप देखोगें ?
हम छोटी खुशियों में खिलते है
हम उन्ही अहसासों से मुरझा जाते है |
- हरेश परमार

मशाल बुझी हुई है ..

मशाल बुझी हुई है ....

कोई फूल मुरझाये
आपको क्या ?
कोई पत्थर पर चढ़ जाए 
आपको क्या ?
क्या कोई इंसान भी जिन्दा है यहाँ
चाँद पर जाने से जैसे
चाँद भी पत्थर हो गया ...
चांदनी हो गई उजाला ...
माफ़ करना मेरे दोस्त !
यहाँ पर कोई तुम्हारी उम्मीद सुनने नहीं आये है
सपने तो ‘पाश’ के समय में भी मरते थे
आज सपनों के साथ इन्सान भी मरता है
पर मशाल मेरी बुझी हुई है ....
-
हरेश परमार

वक्त हमसफ़र है

वक्त बहुत बेवफा होता है
जब कोई होता है पास में
वह दौड़ने लगता है
और जब हम तनहा होते है
उस तन्हाई में वक्त ही साथ होता है...
तन्हाई का सफ़र वक्त के साथ बहुत लम्बा होता है....
वक्त से रहम नहीं, मरहम नहीं...
वक्त हमसफ़र है... और साथी है तन्हाई, इंतजार और
गम को सुनती हुई सुनी दीवारे...
-
हरेश परमार