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Thursday, March 9, 2017

इलेक्शन आने वाला

अरे कोई सुन रहा है
तो कोई देख रहा है
नोटबंदी के इस माहौल में
कुछ अजीब सा हो रहा है...
क्या हो रहा है ?
इलेक्शन आने वाला है ना जी !
तो क्या ?
परेशान जनता को दिखाना जो है की काम कौन करता है !
कैसे बदलाव आ रहा है जी
जिस सड़कों पर गड्ढे थे हजार वह भरे जा रहे है
जहाँ थे उबड़-खाबड़ रास्ते नए बनाये जा रहे है
पुरानी बैंचे बदली जा रही है
इस नोटबंदी की आड़ में
इलेक्शन की तैयारी जो चल रही है ....
अरे ! ये क्या ! इतने बरसों के गड्ढे इतनी जल्दी भरे जा रहे है ?
अरे जनाब ! आपने देखा ही कहाँ है
ऑनलाइन एप का जमाना आया है
सफाई अभियान के चलते फोटो खींचो और सफाई करवाओ
डिजिटल कुछ ऐसा आया है
सुना है कि, इलेक्शन आनेवाला है ...
जनता करें पुकार... तब कोई सुनता नहीं था
आज बिना सुने ही पानी घर पे आ रहा है
अरे जनाब
देखिये साड़े चार साल बाद तुमने जिसको चुना था
आज वह भी जमीन पर आया है
लगता है की अब तो सच में इलेक्शन आनेवाला है ....

मुरझाते फूल

मुरझाते फूल
आपके स्वर्ग हमें नहीं चाहिए
हमें डरना भी नहीं है आपके उस नर्क से
हम छोटे छोटे सपनों लिए आसमान के नीचे
तरोभरी रात में सोनेवाले है...
हा... डर होता है, फुटपाथों पर, बाग़ो-खलिहानों में
मगर जब चांदनी होती है तो मौत का डर कही ओर होता है |
सूरज की रौशनी में जैसे सहज ही फूल खिलते है ...
भूख से तडपे हमारे पेट में
कुछ रोटी मिल जाये, हम फूलों की तरह खिल उठते है |
हमारी ख़ुशी आपकी ख़ुशी से बहुत छोटी है
अहसास है हमें
यह अहसास तब भी होता है
जब हमारे हाथ में आपकी ही तरह रोटी होती है
पर ख़ुशी आपके चेहरे पर नहीं होती
तब हम साम के ढलते सूरज में मुरझाते फूल की तरह कुम्हलाते रहते है
आप चांदनी से नहाई धरती, तारोभरी रात नहीं देख पाते
हमारे अहसास को क्या आप देखोगें ?
हम छोटी खुशियों में खिलते है
हम उन्ही अहसासों से मुरझा जाते है |
- हरेश परमार

जो पल गुजरा

जो पल गुजरा, 
कुछ अपना होता है,
कुछ पराया, कुछ अंजाना...
बिखरासा... 
पर जो पल गुजरा अपनों के साथ अपना होके
वह कभी न हो पराया... बेगाना... अंजाना...
-
आपका - हरेश परमार

अनाम से रिश्ते

कुछ रिश्ते बेनाम से होते है
नाम उनके लिए बने ही नहीं होते
जैसे ही नाम आता है 
अनाम से रिश्ते बिखर जाते है ....

देशभक्ति गीत

मेढक को जब मैंने कहा
प्यार की भाषा बोलो
उसने कहा 
‘ड्राऊ....’
मैंने उसे फिर कहा 
नफरत की भाषा बोल के दिखाओ
उसने कहा
‘ड्राऊ....’
मैंने उसे फिर कहा
चलो कोई नही, देशभक्ति गीत ही सुना दो
‘ड्राऊ....’
‘ड्राऊ....’
‘ड्राऊ....’

आरक्षण और प्याज

आरक्षण और प्याज

आरक्षण ?
यह क्या है ?
यह एक प्याज है, 
जो दिनोंदिन अपनी महत्ता बहधा रही है....
जब वह बिकती थी आम भावो में
बाजारों में
तब उसको कोई पूछता भी नहीं था,
तब वह गरीबों की कस्तूरी थी,
कुछ ना मिला दिन-दहाड़ी में
तो सूखी रोटी के साथ प्याज खा लेते ते थे
आज प्याज ने रुला दिया सब को
अच्छे दिन किसके है
दिखा दिया सब को
आज प्याज प्रासंगिक है
आरक्षण उतना ही
मूल्यवान एवं प्रासंगिक है....
आप प्याज को नकार नहीं सकते
तो फिर आरक्षण को क्यों नकार ?.....
-
हरेश परमार

फटी हुई चादर

फटी हुई 
चादर

ठण्ड रात थी
उनकी चादर फटी हुई थी,
चादर कंप कंपा रही थी,
कभी इधर-कभी उधर लुढ़क रही थी.
बस सिर्फ चादर फटी हुई थी,
गहरी अँधेरी रात थी,
ठण्ड उससे भी ज्यादा ढीठ थी....
रात जितनी लंबी थी, उससे भी ज्यादा लंबी हो रही थी
चादर फटी हुई थी...
नींद आँखों में होते हुए भी
ठंडे तारों को देख रही थी...
 -
Haresh Parmar