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Thursday, March 9, 2017

आंसू

आंसू

आपने रोहित वेमुला की माँ की आँखों में आंसू देखे थे ?
आपने नजीब की माँ की आँखों में भी आंसू देखे थे ?
पर आपको वह नजर नहीं आये ...
वह नेता नहीं थे
वह नेताओं के पुत्र-पौत्र नहीं थे...
आपने उस उना काण्ड में मार खाने वालों के भी आंसू देखे थे
आपको उस वक्त क्या लगा था ?
आपने जब वह फैसला आया
जब देश में आप जो रूपये गर्व से रखते थे
वह रात भर में रद्दी हो गए
आप आंसू को भूल गए या वह आंसू कभी आपको आंसू ही नहीं लगे !
पर उस अराजकता के माहौल में
कुछ 25 जाने जा चूकी है
देश के लिए ...
और उन लोगों के घरों में भी आंसू है
पर कोई अलगारी आता है विदेश छे
वहां हँसता है आप पर
और आके आपके लिए ही रो देता है
आप वह देखते हो
आप जूनून से भर जाते हो
और वह सब आंसू जैसे सूख जाते है
देश के लिए वह बेजान से आंसू
देश की धरती पर कही दफ़न हो जाते है
कहीं जल जाते है
तो कही भुलाए जाते है
#देश के लिए
- हरेश परमार

उनिंदी आँखे ....

उनिंदी आँखे ....

कुछ पल के लिए ही सही 
वह दर्द ना हो
बस कुछ पल के लिए ही
शुकून की नींद
शुकून की सांसे ....
उम्मीद भरे सपने
और न भूलने की रश्मे....
कुछ पल के लिए ही सही
वह अँधेरा घना हो
सितारों भरी राते ...
खामोश सी हवा
और
सुरीली बातें ...
उनिंदी आँखे ....

मरते नहीं है रोहित

संघर्ष है जी जान से 
जय भीम है ईमान से
ना कोई तोड़ पाया है
ना कोई तोड़ पायेगा
जय भीम की राहों में मुश्किलें पग-पग जहान है...
तुमने जो तोडा हौसला
फिर से जुड़ आया है
मरते नहीं है रोहित
शहीद हो के जय भीम से मशाल हो पाया है

इलेक्शन आने वाला

अरे कोई सुन रहा है
तो कोई देख रहा है
नोटबंदी के इस माहौल में
कुछ अजीब सा हो रहा है...
क्या हो रहा है ?
इलेक्शन आने वाला है ना जी !
तो क्या ?
परेशान जनता को दिखाना जो है की काम कौन करता है !
कैसे बदलाव आ रहा है जी
जिस सड़कों पर गड्ढे थे हजार वह भरे जा रहे है
जहाँ थे उबड़-खाबड़ रास्ते नए बनाये जा रहे है
पुरानी बैंचे बदली जा रही है
इस नोटबंदी की आड़ में
इलेक्शन की तैयारी जो चल रही है ....
अरे ! ये क्या ! इतने बरसों के गड्ढे इतनी जल्दी भरे जा रहे है ?
अरे जनाब ! आपने देखा ही कहाँ है
ऑनलाइन एप का जमाना आया है
सफाई अभियान के चलते फोटो खींचो और सफाई करवाओ
डिजिटल कुछ ऐसा आया है
सुना है कि, इलेक्शन आनेवाला है ...
जनता करें पुकार... तब कोई सुनता नहीं था
आज बिना सुने ही पानी घर पे आ रहा है
अरे जनाब
देखिये साड़े चार साल बाद तुमने जिसको चुना था
आज वह भी जमीन पर आया है
लगता है की अब तो सच में इलेक्शन आनेवाला है ....

मुरझाते फूल

मुरझाते फूल
आपके स्वर्ग हमें नहीं चाहिए
हमें डरना भी नहीं है आपके उस नर्क से
हम छोटे छोटे सपनों लिए आसमान के नीचे
तरोभरी रात में सोनेवाले है...
हा... डर होता है, फुटपाथों पर, बाग़ो-खलिहानों में
मगर जब चांदनी होती है तो मौत का डर कही ओर होता है |
सूरज की रौशनी में जैसे सहज ही फूल खिलते है ...
भूख से तडपे हमारे पेट में
कुछ रोटी मिल जाये, हम फूलों की तरह खिल उठते है |
हमारी ख़ुशी आपकी ख़ुशी से बहुत छोटी है
अहसास है हमें
यह अहसास तब भी होता है
जब हमारे हाथ में आपकी ही तरह रोटी होती है
पर ख़ुशी आपके चेहरे पर नहीं होती
तब हम साम के ढलते सूरज में मुरझाते फूल की तरह कुम्हलाते रहते है
आप चांदनी से नहाई धरती, तारोभरी रात नहीं देख पाते
हमारे अहसास को क्या आप देखोगें ?
हम छोटी खुशियों में खिलते है
हम उन्ही अहसासों से मुरझा जाते है |
- हरेश परमार

जो पल गुजरा

जो पल गुजरा, 
कुछ अपना होता है,
कुछ पराया, कुछ अंजाना...
बिखरासा... 
पर जो पल गुजरा अपनों के साथ अपना होके
वह कभी न हो पराया... बेगाना... अंजाना...
-
आपका - हरेश परमार

अनाम से रिश्ते

कुछ रिश्ते बेनाम से होते है
नाम उनके लिए बने ही नहीं होते
जैसे ही नाम आता है 
अनाम से रिश्ते बिखर जाते है ....