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Wednesday, September 14, 2016

क्रांति का नारा : जय भीम का नारा

'वंचित जनता' में प्रकाशित आलेख आपके सामने प्रस्तुत है 
धन्यवाद

Wednesday, December 9, 2015

Apni Parchhai

अपनी परछाई


कभी जिन्दगी की साम ढलने के वक्त 

कुछ अहसास होता है अँधेरे का
कुछ सुकून सा देता है 
वह पल चहचहाते उड़ते अपने घर को लौटते पंख
कुछ शांत से खड़े, पत्तो को संजोयें पेड़
कुछ वक्त के लिए होता है अहसास
अँधेरा घना होने से पहले
सूरज के डूबने के बाद
कुछ लालिमा आसमान की
देती है सुकून
फिर बढ़ता है अँधेरा
हमें दिखाई देती है परछाई
परछाई बढती है
आगोश में लेती है हमें अपनी ही परछाई
और खो जाता है इन्सान
अपने अंधेरें में....
-
हरेश परमार

Tuesday, October 13, 2015

ख़ामोश गलियारें


ख़ामोश गलियारें

ख़ामोश गलियारों में 
अपने अंदर कई चींखे लिए हुए 
ख़ामोशी से 
अंधेरे देखते रहते है ....
कोई तमाशा नहीं है
कोई शोर नहीं है
सब ठीक है
बस यह साँसे चलती रहे 
अपने लिए ही सही
नहीं तो किसी की 
गुलामी के लिए ...
ख़ामोश गलियारों में 
चुपके से
बस
कई चीखे दफ़न हो जाती है ....
-
हरेश परमार

Friday, May 22, 2015

New Link My Books

Please see
https://openlibrary.org/authors/OL7238336A/Haresh_Parmar

Saturday, April 25, 2015

CSIJ Editorial

Creative Space : International Journal
(Bi-monthly - Peer Reviewed Journal)
Multi Lingual and Multi Disciplinary
Issn : 2347-1689
Vol 01 Issue 01 (Jul. – Aug. 2013)

Editor Voice

 Creative Space : International Journal एक सृजनात्मक जगह है. यहाँ पर सभी विषयों में हो रहे रचनात्मक सृजनात्मक कार्य को एक अलग जगह दी गई है. मगर इसका मतलब यह नहीं है की, यहाँ पर कुछ भी सृजन हो. सृजन जो मानव समाज को एक दिशा प्रदान करे एवं स्वस्थ और वैज्ञानिक समाज बनाये. आज हम क्यूरियोसिटी से मंगल गृह के बारे में जानकारी हासिल कर सकते है. यह एक सृजन है. हम कल्पना कर सकते है. मगर दुशरी तरफ हम और हमारा समाज अराजकता में भी जी रहा है. हर देश में आज भी गृह युद्ध हो रहे है. जनता शाशन के प्रति गंभीर है और वह बदलाव चाहती है. हम उस बदलाव के समर्थन में अपना कार्य आगे बढ़ा रहे है.

भारतीय पृष्ठभूमि में जब हम नजर डालते है तो हमें शुकून नहीं मिलता है. भारतीय मानव समाज में कई तरह के भेद व्याप्त है. इस भेद को उजागर कौन करेगा ? भेद को उजागर करने के बाद परिवर्तन के लिए मशाल कौन जलायेगा ? कई प्रश्न उठ सकते है. अगर हम स्वस्थ रूप से विचारे तो इस पर भी कार्य होना चाहिए एवं परिवर्तन के लिए आगे आना चाहिए. भारतीय समाज आज जिस अराजकता में जी रहा है तो समय की मांग है की परिवर्तन हो. मानविकी से ले के तकनिकी तक. यह सृजनात्मक उन सभी का स्वागत करता है जो समाज से प्रतिबद्ध हो एवं परिवर्तन की कामना रखता हो. विद्वानों को यह प्रश्न भी हो सकता है की सुजनात्मक जगह में भी समाज ? यह तो कुच्छ अलग करे की जगह होनी चाहिए ! जब समय सृजनात्मक होने के लिए प्रयासरत है तो मैं या आप कोई नहीं रोक सकता. समाज आज खुद जगह बना रहा है और सृजन कर रहा है. सृजन ही तो है जो कुछ नया बन रहा है. यह जगह तो उस सृजन की आवाज है. आप उस सृजन में अपना योगदान दे सकते हो. सभी मानव अपनी तरफ से कुछ न कुछ सृजन करता है. हम इस पत्रिका के माध्यम से उस सृजन में हिस्सा ले रहे है. आकिर स्रुजनात्माक जगह धरती पर ही है तो हम इतर क्यों ढूंढे ? हमारे पास जो है उसमे ही सृजन के माध्यम से मानव समाज को बेहतर बनायें. मानव समाज स्वतंत्रता चाहता है. उस स्वतंत्रता में सब मानव सामान हो एवं उन में बंधुभाव हो.

यही उद्देश्य है की मानव समाज बेहतर से बेहतर बने. रचनाकार/संशोधक अपनी रचना भेजे और सृजनात्मक लेखन के माध्यम से अपना योगदान दे.


प्रधान संपादक
हरेश परमार
                                                                                                 Email : creativespaceip@gmail.com 


Creative Space : International Journal
(Bi-monthly - Peer Reviewed Journal)
Multi Lingual and Multi Disciplinary
Issn 2347-1689
Vol 01, Issue 02, 2013

Editor Voice

Chief Editor

Creative Space : International Journal का यह दूसरा अंक आप विचारकों के सामने रखते हुए हर्ष अनुभव करते है| कम समय में इस अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका को अपना एक विशेष पाठक वर्ग मिल गया है | साथ ही शुभचिंतक भी जुड गए है | हमारा उत्साह बढ़ाने के लिए सभी अभिभावक का नम्र अभिवादन, आज हम अपनी भाषा के बचाव में जुड़े हुए हैं | जहाँ देखो वहाँ पर भारतीय भाषा के नष्टप्राय होने का खतरा सब देख रहे है | भाषा का तथाकथित ढांचा बिखर रहा है, मगर यह संकेत है कि समन्वय एवं समानता का व्यवहार में जो भाषा सरल हो वह अपनायी जायेगी| हिंदी फिल्में आज २०० करोड के पार चली गई है | यह आंकड़ा भाषा पर रहे खतरें को धता भी बता रहे है | फिर भी खतरा तो है, यह समय है अपनी भाषा को रोजगारलक्षी बनाना हैं| जो भाषा रोजगार देगी वह भाषा का विकास त्वरीत रूप से होगा ; हम किसी का इंतज़ार नहीं कर सकते कि वह आयेंगे या कोई आएगा जो भाषा को बचायेगा | हमें अपनी भाषा में रोजगार उपलब्ध कराना पड़ेगा ही | हम रोजगार देने में नाकाम रहे तो, भाषा भी हमें  बचा नहीं सकती, यह इतिहास बन जायेगी | मगर जो भाषा आज भी रोजगार के लिए ज्यादा जानी जाती है, वह आम जनता से बहुत दूर है | आम जनता  तो आज भी अपनी मातृभाषा को ही रोजगार  एवं व्यवहार की भाषा समझ रहे हैं और उसे उपयुक्त तरीके से व्यवहार में प्रयोग कर रहे है | तो खतरा किससे है हमारी अपनी भाषा को ?

शिक्षा का दीपक सब को जगा रहा है और उससे परम्परा एवं आधुनिकता का द्वंद्व भी सामने आया है | मगर क्या शिक्षा ही वह चिनगारी है, जो समाज रूपी दीपक जलाती है ? भारत में शिक्षा प्राप्त किए हुए उच्च शिक्षित लोग स्त्री-पुरुष में कितनी समानता रखते है या सामान व्यवहार करते है ? कुछ शिक्षित लोग आज भी स्त्री-पुरुष की असमानता में विश्वास रखते है | कुछ लोग स्त्री गर्भ को गर्भ में ही मार देते है | आज भी समाज में इज्जत की दुहाई पर स्त्री का ही भोग लिया जाता है | हमारा समाज प्राचीनता के गुण गानें में तो सब से आगे है मगर, अपने समाज में फैली यह बुराई को अनदेखा कर देता है | आखिर हमारी शिक्षा हमें किस ओर ले जा रही है |

मलाल युसुफजई ने भी शिक्षा प्राप्त की और उसने अपने समाज में स्त्री शिक्षा की हिमायत की, उसकी उम्र कितनी थी ? जिस उम्र में बच्चे शिक्षा के साथ साथ खेलते है उसी उम्र में उसे आतंकवादियों की गोली शिकार हुई | लेकिन वह हारी नहीं और पूरी दुनिया  के सामने शिक्षा अधिकार और हक की बात की | शिक्षा के संदर्भ में उसके विचार को पूरी दुनिया ने सराहा और  आज भी उसके लिए कार्य कर रही है | भारत के गुजरात में इसी समय के आस-पास ठान जिल्ले में समानता, न्याय की मांग करने वाले दलित युवाओं को सरेआम मार दिया गया.... उस पर पुलिस की गोली चली थी | अफ़सोस की बात है उसकी बात भारत के दिल्ली तो क्या गांधीनगर ने भी नहीं सुनी  नहीं जाती है | आज भी उस मासुमों का घाव हरा-का-हरा है | न्याय उनसे कोशों दूर है | उन्होंने भी शिक्षा प्राप्त की थी और अन्याय, असमानता के खिलाफ आवाज उठाई थी | ऐसी कई घटनाएँ  आये –दिन भारत में  घटित होती है | अन्य देशों की घटना पर भारतीयों की आँखों में आंसू आ जाते है मगर, यहाँ कोई बलि चढ जाए तब भी संवेदनशील भारतीय लोगों के पेट का पानी तक नहीं हिलता  हैं |

आप यहाँ पर प्रकाशित  लेखो का अध्ययन कर सकते हो | आपको भारत की दो धाराएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देगी | आप इस भारत का यथार्थ रूप से अध्ययन कर सकते है | स्वस्थ वैचारिक द्वंद्व होना चाहिए किसी भी क्षेत्र में | इस क्षेत्र से नये शोध लेखक भी हमें मिल रहे है |

प्रस्तुत शोध पत्रिका का दूसरा अंक आपके सामने रखते हुए नयें लेखकों के विचारोंतेजक लेखों को आमंत्रित करता हूँ | लेख मात्र लेख न होकर आपकी प्रतिभाओं को उजागर कर सके | यही इस पत्रिका का  मूल उद्देश्य है | 


प्रधान संपादक
हरेश परमार

Creative Space : International Journal
(Bi-monthly - Peer Reviewed Journal)
Multi Lingual and Multi Disciplinary
Issn 2347-1689
Vol. 01, Issue 3 2013

Editor Voice

Chief Editor

यदि हमारी सभ्यता एवं संस्कृति महान होती, तो इस देश में कोई गरीब या अमीर नहीं होता | कोई उच्च-नीच न होता, अराजकता न होती, लिंग-भेद न होता, शिक्षा के क्षेत्र में हम दूसरे देशों से आगे होते, मगर ऐसा नहीं है | अगर हम यह कहेंगे कि हा, तो यकीनन हम अंधे है या फिर पागल | कहने का अर्थ यह है कि हम अपने भूतकाल से अभी बाहर निकले नहीं है और साथ ही भूतकाल को सही रूप से जानने की कोशिश नहीं की हैं | भारत देश में विभिन्नता है और यह वैविध्य भारत की विशेषता तब बनेगी जब विविधता एकता में परीणित होगी | अलग-अलग भारतीय भूमि में बसे लोग अपनी ही विशेषता और विशेष अधिकारों को बसाए हुए है | संस्कृति को हम जानते ही नहीं है, संस्कृति तो कभी हमें यह नहीं सिखाती हैं कि जो धरती पर पैदा हुआ है, वह तुमसे उच्च या नीच है ! अगर संस्कृति ऐसा कहती है, तो फिर संस्कृति को बदलना होगा | जो संस्कृति एक मनुष्य को उच्च और एक को नीच स्थापित करे उसे संस्कृति नहीं कह सकते हैं  |

भारत देश में शिक्षा को जिस जिम्मेदारी से अपनाया जाना चाहिए, उस जिम्मेदारी से स्वीकार्य नहीं गया है | यहाँ पर तीन भेद है सरकारी, अनुदानित एवं निजी | हम अपनी भावी पीढ़ी को क्या पढ़ा रहे है ? हम हमारी संस्कृति और सभ्यता की महानता की बाते तो बड़ाई से करते है | मगर हमारी मातृभाषा एवं हमारी जन भाषा को छोड़ रहे है | फेक्ट्रियों में जैसे यंत्र पैदा होते है हमारी भावी पीढ़ी भी उसी तरह तैयार हो रही है और उससे देश कई अपेक्षाएँ रखता है | क्या वह देश का अच्छा नागरिक बन पायेगा ?

उच्च शिक्षा में भी निजीकरण की धूम मची है, जिसके पास जमीं, सत्ता और पैसा है | उनके लिए शिक्षा एक सफ़ेद धंधा है | लोग भी उसी धंधें को मानने लगा है और आधुनिक समाज के साथ चलने के लिए अपने आप को ही लुटा रहा है | हमारे आचार एवं व्यवहार में जमीं आसमान का फर्क दिखाई देता है | कुछ संस्थान के पास तो जमीं भी नहीं होती और पाठशाला, कोलेज एवं विश्वविद्यालय घर में चलाते है, जिसके पास अपना  कुछ नहीं पी बिना पैसे के .... | हम महान सभ्यता के वाहक है और जब कोई उसमें से जाति के आधार पर आगे आता है, तब उसका विरोध व्यवस्थापन के लोग बड़ी सूक्ष्मता से करते ! कुछ संस्थान को जब सरकारी महकमों की मान्यता मिल जाती है, तो उनके लिए यह संस्थान फेक्ट्री के समान बन जाता है | बाते उच्च और शिक्षा परस्त | कई संस्थान जैसे कुछ निर्माण करती हो वैसे दिखाई देता है, मगर वहाँ विधार्थियों का मानसिक दोहन ही होता है |उन पर शिक्षा लादी जाती है, वह शिक्षित नहीं रट्टा मारे और आगे बढे ... आपको लगता है, यह रोबोट से भी गए गुजरे हमारा भविष्य निर्माण करेंगे | मगर करेंगे जरुर | जैसे कई पक्षी होते है कुछ सीमा तक वह पंखे पसारे उड़ते है| मगर उसमें भी कुछ पंछी पंखे पसारे ऊँची उड़ान भरते है वह आसमान से सारी धरती देखना चाहते है | दुनिया उन पर हँसती है मगर वह बिना भय के आगे बढ़ता है और वही एक दिन निर्माण करता है | वह जमीं से आसमान तक को जानता है, वह भूले-बिसरे को मार्ग दिखता है और अपना कर्तव्य निभाता रहता है | वह जमीं पर आ कर बड़ी बड़ी बाते नहीं करता, वह बड़े कार्य भी करता है | हमें उम्मीद है ऐसा होगा | वह कोई भगवान या इश्वर, अल्लाह या जीसस नहीं होगा, पैगम्बर नहीं होगा, मगर हमारे तुम्हरे जैसा ही जन्म लेने वाला और मरनेवाला होगा | वह शेर की खाल में छुपे भेडियें की असलियत को पदर्शित करेंगा |

भारत में सरकारी नौकरी अब फिक्स पगार से मिलती है | विकास के गाने गानेवाले गुजरात सरकार इस सूचि में सब से आगे है | जो शिक्षा पाकर पांच साल फिक्स पगार पता है | उस युवा से आप कैसी अपेक्षा कर सकते है ? आपको नहीं लगता की यह एक सोची-समझी गुलामी की प्रथा है | क्या इस प्रक्रिया से भ्रष्टाचार बढता है या कम होता है ? लोग युवा को शक्ति के रूप में देखते है, मगर पांच साल के फिक्स पगार में वह कौन-सी शक्ति दिखायेगा ? जब की पांच साल तक वह सरकार और जिस संस्था में काम कर रहा है |उस संस्था में गुलाम की तरह रहता है | अपने आप में खोया हुआ और भय से त्रस्त, अराजकता के इस माहौल में वह कौन-सा पौधा बोएगा ? अपने परिवार को भी वह न्याय नहीं दे सकता, तो वह राज्य एवं देश के बारे में कब सोचेगा ? वह उसके बारे में सोचे न पाए इसिलिए उसे रोकने की प्रक्रिया ही, यह फिक्स पगार यानी गुलामी प्रथा है | निजी संस्थान तो इससे भी गए गुजरे है, वहाँ पर तो उससे गुलामों की तरह काम भी लिया जाता है और पगार भी कम ही मिलती है  | उसका जन्म तो जैसे यही गुलामी करने के लिए ही हुआ है | अगर नर्क की कल्पना की जाए तो यह नर्क है और स्वर्ग की कल्पना इससे भी बुरी है | आजाद भारत और युवा भारत के लोग एवं उस में भी युवा सबसे बड़े गुलाम है | अगर हम गुलाम है तो फिर हम आजादी के पर्व क्यों मानते है? हमारी शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था, सरकारी-निजी संस्थान व्यवस्था को देखते हुए हम गर्व से कह सकेगें की हम आजाद है ? हमारे लेखकों से निवेदन है की इस और अपना ध्यान केंद्रित करे और व्यवस्था परिवर्तन के लिए कलम उठायें |

इस अंक के साथ हम नए साल में प्रवेश कर गए है | हमारी टीम की तरफ से आप सब को नए साल की शुभकामनायें | हम कोशिश करते है की आपको समय पर यह अंक मिले मगर व्यस्त समय के रहते यह संभव नहीं हो पता | फिर भी आपका सहयोग हमें मिलता रहा है | आपके सुजाव भी हमें हमारे मेल पर भेजे जिससे हम आपको बेहतर से बेहतर देने की कोशिश करे | इसके साथ ही हम अगले अंक पर मिलेगे | आपके सहयोग की अपेक्षा रहेगी |


प्रधान संपादक
हरेश परमार

Creative Space : International Journal
(Bi-monthly - Peer Reviewed Journal)
Multi Lingual and Multi Disciplinary
ISSN 2347-1689
Jan. to Feb. 2014
Vol 02, Issue 01

Editor Voice
I

Chief Editor

हमने प्रकृति का दोहन किया है और कर रहे है | शैक्षणिक संस्थानों ने टेक्नोलॉजी को तो अपनाया है, फिर भी कागज का उपयोग सीमित नहीं हुआ है | हम इस भागीदारी में कागज का उपयोग सीमित करने की दिशा में सोच सकते है एवं उसे अमल भी कर सकते है | उच्च अभ्यास में लघुशोध निबंध, प्रबंध, प्रोजेक्ट, असाइनमेंट आदि हम कागज के दोनों तरफ उपयोग कर के ले सकते है; सोचो अगर ऐसा होगा तो एक पर्यावरणीय क्रांति ही आ जायेगी और हम उसके समर्थक कहलायेगें | यह एक विचार है किन्तु विचार को ही तो अमलीजामा पहनाया जाता है !

उच्च अभ्यास में छात्रों को गुलामों की तरह पिसा जाता है और छात्र तीन से पांच साल तक गुलामी के अंधेरों में पीसकर बाहर निकालता है | हम उनसे क्या अपेक्षा रखेगे भला ! फिर भी  गुलामी से ही तो स्वतंत्रता की हवा को पहचाना जाता है, उसी तरह हम डॉ. लगा के घूमते रहते है | हम जिसे देश दुनिया के विद्वानजनों में गिनते है, वह अध्यापक अपने अंडर में कर रहे शोध अध्येता को जाति, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक रूप से कमर तोड़ देते है | शोध अध्येता जब मानसिक रूप से प्रताड़ित होता है और घर-परिवार की जिम्मेदारी उसमें भी खुद की जिम्मेदारी को समझे हुए, वह तीन से पांच साल गुलाम बन के रह लेता है | हम आप अपनी शिक्षा के मंदिर कहे जानी वाली युनिवर्सिटी में आये दिन देखते रहते है | हालाँकि सब अध्यापक ऐसे नहीं होते है, मगर फिर भी ऐसे लोग शिक्षा क्षेत्र को अपना अड्डा स्थापित करने की फ़िराक में हैं | वह मानसिक रूप से अपने पर हुए अत्याचारों को दूसरों पर थोपते है, जिससे उसे मानसिक संतुष्टि मिलती है | प्रस्तुत अंक में हमने विद्यार्थियों पर हो रहे अत्याचारों एवं भेदभावों को मद्देनजर रखते हुए शिक्षा की गणमान्य संस्था यूजीसी, नई दिल्ली ने यह बात की गंभीरता को समझते हुए, विधार्थिओं पर होते शोषण को रोकने के लिए कई आदेश युनिवर्सिटी, संस्थाओं एवं कॉलेजों को दिए हैं | कई युनिवर्सिटी ने उसे लागू किया है, तो कुछ ने मात्र यह आदेश है उसे जैसे थे रहने दिया है | विद्यार्थी संगठन हलकी राजनीति में लिप्त है | इसलिए ऐसे आदेश आये-गए हो जाते है | फिर भी कुछ यूनिवर्सिटी को महिला संबंधित हेल्पलाइन शुरू करना ही पड़ा | मगर यह मात्र कागजी करवाई रह गई, तो पत्तों के महल जैसा हो जाएगा | आज की स्थिति में हमें जागृत हो के  शिक्षा के इस अराजक  माहोल को मिटाने की कोशिश मिल के करनी चाहिए | जिससे जाति-लिंग, वर्ण-ज्ञाति, आर्थिक, मानसिक अत्याचार होने बंद हो जाये और हम स्वस्थ मानसिकता के साथ समाज, राज्य, देश के बारे में सही सोच और कार्य कर सके |

हमारे सामने बेकारी और युवाधन का अनुचित उपयोग भी एक गंभीर प्रश्न है | जिसके सामने तथाकथिक राजनीतिक एवं विद्वान मौन हो जाते है | युवा सोच पर नाजीवादी शासन थोप देते है | युवा सोच जो बनती भी नहीं और उसे गलत रूप से खंडनात्मकता की ओर मोड़ा जाता है | सरकारें निजी शैक्षणिक संस्थानों को प्रोस्ताहन दे कर अपनी दूकान चला रहे है; जब चुनाव आता है तो उन्ही पैसों से वोट को ख़रीदा जाता है | चुनाव आयोग ने भी सामान्य जन चुनाव से दूर ही रहे इसलिए चुनाव में खड़े रहने की फ़ीस ही इतनी रक्खी है कि जन साधारण की कमर ही टूट जाए | कई मुद्दे होते है मगर बच्चे जैसे चोकलेट के लिए लड़ाई करते है; वैसे राजनितिक लोग सत्ता के लिए लड़ते दिख जाते है | मेरी यह भाषा असंयमित होते हुए भी वास्तविक है और मुझे लिखना पड रहा है | क्या हम सही में सृजनात्मक या रचनात्मक है ? शायद नहीं ... | कम से कम मैं जीस स्थिति को देख रहा हूँ| वहाँ से तो मैं यही देख रहा हूँ | यह मेरे निजी विचार भी हो सकते है; आपके विचार भी आवकार्य है |

Creative Space : International Journal में लगातार काम करने और हमेशा रचनात्मक रहने पर अनिल खावडू को सहायक संपादक की जगह संपादक बनाया गया है | वह इस जर्नल को आगे ले जाये वही शुभकामनाए | इस तरफ डॉ. भरत भेड़ा भी अपना रचनात्मक सहयोग देते रहे है और लगातार जर्नल के बारे में अपने विचार प्रस्तुत करते रहते है | इस बार के अंक के वह अतिथि संपादक है | इन दोनों ने मेरी जिम्मेदारी कुछ कम की जिससे मैं अपना क्रिएटीव काम कर सका हूँ और आपके सामने यह अंक प्रस्तुत कर पाया हूँ | और भी कई साथी है जिसने हमें यथा समय सही दिशानिर्देश दिए; उनके भी हम आभारी है | इसके साथ ही हमने अपना ब्लॉग आरम्भ कर दिया है जहाँ से आप कभी भी कोई भी जानकारी प्रस्तुत पत्रिका के बारे में ले सकते हो | यह ब्लॉग आप नेट जगत में http://creativespaceip.blogspot.in यहाँ से देख सकते हो | आप ब्लॉग के माध्यम से अपनी बात भी रख सकते हो | आप हमें पत्र या मेल के माध्यम से आपके सुझाव अवश्य भेजें |

प्रधान संपादक
हरेश परमार
Conact : 09408110030

  
Editor Voice
II
Guest Editor :

वस्तुतः साहित्य समाज को सदैव से परिष्कृत करता आया है | यूँ कहे तो भी गलत नहीं होगा कि उनकी धरोहर है | नये विचारों को प्रस्तुत करके समाज के लिए नविन पथ का मार्गदर्शक बनता है | क्योंकि विश्व की बड़ी से बड़ी क्रांति या आन्दोलन के पीछे साहित्य की अहम भूमिका रही है | उक्त विधान को ख़ारिज नहीं कर सकते है | साहित्य ही मनुष्य को परिमार्जित करता है, जीने की राह दिखता है | स्पष्टत: साहित्य और मानव का नाता अटूट एवं अभेद है |

आज के अति आधुनिक युग में विश्व मनुष्य की जेब भरा हुआ लगता है | भोगवादी संस्कृति मनुष्य को स्वार्थी तथा अकेलेपन के दलदल में धकेल रही हैं | भोगवाद में डूबा मनुष्य अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहा है | एक प्रकार से घुटन भरी जिंदगी जीने के लिए अपने को बाध्य करता जा रहा है | एक ओर जहाँ मानव चाँद और मंगल पर निवास करने की चाहना करता है , वहीं दूसरी ओर खुद को हीन युग में धकेल रहा हैं | क्योंकि आज के मानव की मानसिकता रुग्ण  एवं सड़ी- गली है | इसलिए आधुनिक युग में जीवन-यापन करने के बावजूद भी विचारों की दृष्टि से आदिकाल में जी रहे है|

भारत देश आज़ादी के स्वप्नें को कई सालों पहले साकार कर चुका हैं | किन्तु आजादी के स्वप्नें को मर्यादित वर्ग तक सीमित कर दिया गया हैं | आज भी नारी एवं पिछड़ें वर्गों को आये दिन शोषण की आग में धकेलने का षडयंत्र पला-फुला हैं | मुक्ति चाहना आज भी इन शोषित वर्गों से सेकड़ों कौसों दूर है | प्रस्तुत कहावत के अनुसार “दिल्ही दूर है” के मुताकिब नारी एवं पीड़ित वर्गों से समानता तथा बंधुता काफी दूर है | उनको आज भी समाज के हाशिये पर रखा जाता है | यूँ तो प्रबुध्ध समाज हितेच्छुओं के दिमागी सोच में बदलाव अवश्य आया हैं | साथ ही शोषण के आयामों में आधुनिक रवैये को प्रवृत्त भी किया हैं | आज के संचार माध्यमों की मोजुदगी विभिन्न क्षेत्रों के शोषितों से अवगत होते हैं | कहने को ही भारतीय अति आधुनिक युग में जी रहे हैं, किन्तु वैचारिक सोच एवं कार्य पध्धति के आधार पर हम अपने आप को पाषण युग में स्थापित करते हैं | आज भारत देश की अलग-अलग राज्यों में या क्षेत्रीय भू-भागों में जीवन-यापन करने वाले लोगों के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग तथा नारी की स्थिति आज दयनीय और जानवरों से भी गयी गुजरी हैं | साथ ही आधुनिकता की दुहाई देने वाले शहरी लोग भी शोषण के शुभ कार्य में पीछे नहीं हैं | शोषित वर्गों का शोषण आंगनवाडी से लेकर विश्वविद्यालय तक होता हैं | कहीं नोकरी को लेकर तो, कहीं व्यवसाय, तो कहीं राजनीति |  नारी भी दोहरें-तिहरें अभिशाप को झेल रही हैं | एक तो मादा और पुरुषों की अनुगामी | नारी आज के युग में घर की दहलीज से लेकर कहीं पर सुरक्षित नहीं हैं | आये दिन बलात्कार, घरेलू हिंसा, हत्या अमानुषिक अत्याचार, घुटन, संत्रास, अवहेलित आदि का शिकार नारी होती रहती हैं |

 प्रस्तुत अंक में उक्त संवेदनशील विषयों पर साक्षरों की कलम से विचारों का प्रवाह चला हैं | उनके माध्यम से अवहेलित वर्गों तथा नारियों के प्रति सहिष्णुता का पक्ष रखना सार्थक कार्य हैं | क्योंकि ज्ञान के समन्दर को समेट लेना असम्भव-सा हैं | किन्तु नवोदित विचारकों, साक्षर चिंतकों के अथाग प्रयास से ज्ञान के अभ्युत्थान रूपी दीपक यानी हमारी पत्रिका को अधिक सामर्थ्यता प्रदान करता हैं | आशा रखते हैं ज्ञान के दीपक को प्रज्वलित करते हुए कहीं पर भी गलती हुई हो तो क्षमार्थी हैं |

धन्यवाद

अतिथि संपादक

डॉ. भरत भेडा
Assistant Prof. (Contrect),
Hindi Department,
DKV Arts and Science College,
Jamnagar (Gujarat).

Creative Space : International Journal
(Bi-monthly - Peer Reviewed Journal)
Multi-Lingual and Multi-Disciplinary
ISSN 2347-1689
March to Aprile. 2014
Vol 02, Issue 02

Editor Voice
I

Chief Editor

साहित्य समाज का पथप्रदर्शक है | समाज के विभिन्न अंग-उपांगों में साहित्य निहित रहता है | साहित्य के बिना समाज अपाहिजों के समान है | आज भारत देश ने चाहे वैज्ञानिक हो या सामाजिक या शिक्षा का क्षेत्र हो सब में विशेष तरकी की है | मानव आज की सभ्यता को पूर्णतया अपनाने लगा है | उनके चाल-ढाल को सूक्ष्म रूप से देखने लगा है | उस तहजीब को साथ लेकर चलना सिख गया है | आज विश्व के साथ कदम-से –कदम मिलाकर चलने के काबिल हो गया है |

मूलतः देखा जाए तो शिक्षा का व्यापारीकरण मानव को शिक्षित या साक्षर अवश्य करता है | किन्तु विपरीत परिणाम के आमंत्रित भी करता है | आज की जनरेशन ज्ञान की गठरी को प्राप्त अवश्य करती   है | साथ ही सामाजिक या राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य भूलती जा रही है | यूँ कहे तो गलत नहीं होगा कि विस्तुत तथा व्यापक ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी मानव अपने आप में सिमटता जा रहा है | विशाल परिवेश का आदि होकर भी संकुचित दायरे में अपने को सिमट लिया है |

शिक्षा का उदेश्य मानव को अज्ञानता के परिवेश से निकालकर, ज्ञानता रूपी प्रकाश को प्राप्त करवाना है | उन्हें विभिन्न क्षेत्रों से अवगत कराना है | उनमें सत्यता की  जागरूकता लानी है | जिनसे वह सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक आदि के प्रवृत हो सके | किन्तु आधुनिक विचारधारों की बदोलत आज का मानव शिक्षा से प्राप्त संजीवनी का गलत उपयोग कर रहा है | शायद आज गांधीजी जीवित होते तो, उनको भी अफ़सोस होता कि हमने इन लोगों के लिए अंग्रेजों से लड़ाई की थी ! जो अपनी सुख-सुविधा के लिए अन्य का अहित करे | जो अपना हुका चलाने के लिए दूसरों का काटे | जो खुद को आरामदायक जीवन के लिए सुष्टि का नाश करे | आधुनिक मानव की आज यहीं तो फितरत है | कि मेरा मेरे बाप का दूसरा जाए भाड में | शिक्षा के नाम पर स्व संचालित दुकानें खोलकर लोगों के भविष्य के साथ खेल रहे है | समानता की बात तो दूर है, वह असमानता का फैलाव कर रहे है | जिसका सही उदाहरण सौराष्ट्र विश्वविद्यालय है | उनके शास्नाधिकारियों की मिली भगत छात्र के भविष्य के साथ खेल रहे है | क्योंकि आधुनिक मानव का सूत्र जिसकी लाठी उसकी चलती है | सौराष्ट्र विश्वविद्यालय उनका जीवंत दृष्टांत है | जँहा शिक्षा की आड़ में शिक्षा के अमलादारों ने बेईमानी ज्योत जगायी है | भाई- भतीजे वाद की स्थापना की है | यह आज के  शिक्षा संस्थानों की वास्विकता है |

विशेषत: इस अंक में प्राप्त सभी शोधलेखों को स्वीकार करते हुए हर्ष का भाव महसूस कर रहा हूँ | आने वाले शोधार्थी ज्ञान की नई क्षितिज को प्राप्त करे ऐसी आशा भी करते है | प्रस्तुत अंक में विभिन्न लेखों के माध्यम से लोगों अपनी बात रखी है | जो साम्प्रत युग वास्तविकता है |

Creative Space : International Journal ने अपना ब्लॉग और वेबसाइट आरम्भ कर दि है जहाँ से आप कभी भी कोई भी जानकारी प्रस्तुत पत्रिका के बारे में ले सकते हो | यह वेब एवं ब्लॉग आप नेट जगत में http://eklavyapublication.in और http://creativespaceij.blogspot.in यहाँ से देख सकते हो | आप ब्लॉग एवं वेबसाइट के माध्यम से अपनी बात भी रख सकते हो | आप हमें पत्र या मेल के माध्यम से आपके सुझाव अवश्य भेजें |

प्रधान संपादक
हरेश परमार
Conact : 09408110030


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Guest Editor

मनुष्य जाति की उत्पत्ति से लेकर आज के आधुनिक समय तक तथा आनेवाले समय में उनके विचारों, भावों, संवेदना, सृजन अभिव्यक्ति आदि का सशक्त प्रत्यायन एवं अभिव्यक्ति का साधन भाषा ही हैं | भाषा का संबंध मनुष्य के विभिन्न क्षेत्रों के साथ हैं | क्योंकि कबीर भी कहते है कि- ऐसी बानी बोलिए जो मन का आपा खोय | ओरन शीतल लगे आप भी शीतल होय | बानी यानी भाषा, भाषा ही मनुष्य के व्यक्तित्व की असली पहचान बनती है | जब भाषा की उत्पत्ति नहीं हुई होगी, तब लोग संकेतार्थ रूप में अपने विचारों की प्रस्तुति करते होगे | इन्सान चाहे किसी भी देश का क्यों न हो किन्तु उनके विचारों का प्रादुर्भाव तो भाषा के माध्यम से हो होगा |

मूलतः कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य के विकास का प्रथम सोपान उनकी मातृभाषा ही है | मातृभाषा की अवहेलना उनके विकास को परास्त भी कर सकती है | क्योंकि मातृभाषा या मधर टंक के माध्यम से व्यक्ति प्रथम बोलना सीखता है | दुसरे के भावों को समजता हैं | उनके द्वारा ही संकेत रूपों की गुथी समझता है | लेकिन वास्तव में हमें मातृभाषा के प्रति रुझान कम होता हुआ नज़र आता हैं | गुजरात के बच्चों गुजराती भाषा बोलना, पढ़ना, लिखना नहीं आता हैं | क्यों ? ऐसा क्यों जिस क्षेत्र में रहकर भी उनकी भोगौलिक भाषा के प्रति रुखापन क्यों ? क्या हमें गुजराती भाषा बोलने में संकोच हो रहा हैं ? क्या गुजरातियों के जनीन से गुजराती भाषा नष्ट हो गयी है ? आदि सवालों के जवाब सन १९३५ की मेकोलो की शिक्षा पध्धति है | जिन्होंने अपनी दुकान चलाने के लिए सफ़ेद क्लर्क पैदा किए थे | आज का मानव अंग्रेजी भाषा के प्रति अधिक लगाव रखने लगा है | उनकी बदोलत से लोग अपनी मातृभाषा के प्रति रूखापन रखने में उत्सुक होते जा रहे है | आज उनके लिए गुजराती में बोलना अपमानजनक लगता है | क्योंकि ऐसा न करने से उनकी अज्ञानता प्रदर्शित जाएगी | ऐसा भय सदैव उनको सताता है | इसीलिए वह अपने बच्चों अंग्रेजी भाषा सीखने पर बल देते है और साथ ही अपना रुतबा कायम करता है |

गुजराती की भाँति हिन्दी भाषा का भी यहीं हाल है | जो जिन्दा भी नहीं और मरी भी नहीं | हिन्दी भाषा में सभी प्रकार की विशेषता होने के बावजूद आज भी भारत देश राष्ट्र भाषा  के रूप स्थापित नहीं हो पा रहीं हैं | आज भी लोग राष्ट्र भाषा के नाम पर अपनी दुकान चलाकर बंध कर देते है |  क्या भारतीय मानस गुलामी की झंझीर को कभी भी तोड़ना नहीं चाहता हैं ?

प्रकाशित हुए अंक में विभिन्न क्षेत्रों के लेखों का सम्मलित होना, मनो ज्ञान की विविध दिशाओं का आंकलन हुआ हैं | नये शोधार्थी के लेखों उक्त पत्रिका को नवयौवन प्राप्त करवाया हैं | आशा करते है कि आने वाले दिनों में और भी अनुसंधासु इनमें अपना योगदान प्रदान करेंगे | साथ ही साहित्य रसिकों को अपना ज्ञान प्राप्त करवायेंगे |

धन्यवाद                                                                                      

डॉ. भरत भेडा

Creative Space : International Journal
(Bi-monthly – Refereed & Peer Reviewed Journal)
Multi-Lingual and Multi-Disciplinary
ISSN 2347-1689
May – Augest, 2014 (Joint Issue)
Vol 02, Issue 03-04

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I

Chief Editor

हम सभ्य एवं विद्वद समाज आँखे मुंद के यथार्थ को भ्रमित रूप से स्वीकार कर रहे है | भारतीय समाज आज भी प्राचीन अव्यवस्था जैसी वर्ण-जाति व्यवस्था में अटा-पड़ा| है जब कि हम विकास का बिगुल बजाते है | देश-विदेशों में हमने दस्तक दी है, आध्यात्मिकता के पैरोकार बन के मगर यह भूल जाते है कि हम अशांत है |

सरकार निजीकरण को बढ़ावा देती है और हम हाथों पर हाथ धरे बैठे उसी में फँसते जाते है | निजीकरण के आधार पर सरकार अपनी जिम्मेदारी को कम करके निजी हाथों को मजबूत एवं सरकारी और समाज को कमजोर बनाने का षडयंत्र रचा जा रहा है | हम साक्षी है, मगर मौन साक्षी | हमें वर्चस्ववादी लोगों एवं नीतियों को समझना होगा, नहीं तो हम अपनी ही भूल पर पछताएँगे | निजीकरण यानी यंत्रीकरण | आप अपने बच्चे को जिस निजी स्कूल में भेजते , कभी जाना है कि वहाँ पर किस तरह के शिक्षक पढ़ा रहे है ?  बच्चा क्या पढ़ रहा है ? इसे शोषण की परम्परा को कायम बनाना कहते है | सरकारी महकमें की स्थिति भी बुरी है यह स्वीकार है, मगर सरकार ने किस जिम्मेदारी से उसे कम आय में रक्खा है, यह भी एक प्रश्न है | हमें अगर समाज को मजबूत एवं सशक्त बनाना है, उसमें वह जज्बा लाना है, जो क्रांति एवं परिवर्तनकामी हो तो, हमें आज ही जागना पड़ेगा हमारे बेहतर कल के लिए |

साहित्य एवं शोध का काम है, समाज के सामने सच लाना, तटस्थ सत्य | हम हमारे अंतरात्मा या मन को पूछे की क्या हम सही में समाज के सामने तटस्थ एवं यथार्थ सच ला पाए है ? हालाँकि हम मानते है कि कुछ शोध आपको मात्र शोध लगता है, मगर उसका असर समाज पर भी यहाँ तक कि अपने आप पर भी इसका असर पड़ता है | अगर हमारे ख़यालात भेद्कारी है तो, पूर्वग्रहयुक्त बात समाज के सामने आ सकती है | वह अगर खंड्नात्मक हो तो मालूम होता है कि हम भी रचनात्मक नहीं है | हमें यह स्थान मिला है, तटस्थ एवं सृजनात्मक स्वस्थ विचारों को आवाहन देने का अगर ऐसे विचारों को हम वहाँ नहीं कर पाते तो यह हमारा प्रयास निष्फल हम समझेगे | सच यह भी है कि हमें इतने कम समय में कई लेख मिले एवं रचनात्मक लेख पाके; हमें उम्मीद भी बढती है, हम कुछ आलेख हमारे पाठकों के सामने इसलिए भी रखते है कि वह खुद आलोचना कर सके | आखिर समाज हो या पर्यावरण, साहित्य, विज्ञान, शास्त्र उन्हें हमें बेहतर ही तो बनाना है |

उम्मीद है आने वाले अंक में हमें रचनात्मक एवं क्रांति दर्शक लेख मिले, जो समाज को सच बताएं एवं उसको यह बताएं की हम किस भ्रम में जी रहे है |

यह अंक की देरी के लिए क्षमा चाहते है | हमारा बोर्ड इस समय में काफी व्यस्त था जिसके तहत हम अब आपके सामने यह संयुक्त अंक प्रस्तुत कर रहे है |

Creative Space : International Journal ने अपना ब्लॉग और वेबसाइट आरम्भ कर दि है जहाँ से आप कभी भी कोई भी जानकारी प्रस्तुत पत्रिका के बारे में ले सकते हो | यह वेब एवं ब्लॉग आप नेट जगत में http://eklavyapublication.in और http://creativespaceij.blogspot.in यहाँ से देख सकते हो | आप ब्लॉग एवं वेबसाइट के माध्यम से अपनी बात भी रख सकते हो | आप हमें पत्र या मेल के माध्यम से आपके सुझाव अवश्य भेजें |

प्रधान संपादक
हरेश परमार
Conact : 09408110030

  
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Guest Editor

सह संपादक की नजर से ...........................

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हम विकास कर हैं | ऐसा हमें लगता हैं, लेकिन हमारी जमीन और वास्तविकता कुछ ओर ही बयाँ करती है | अफ़सोस कि  हम शिक्षित समाज भी कुछ भ्रमित अवस्था में जी रहे है | हम शाहमृग वृति में जी रहे है, हमने हमारी व्यवस्था को भेद्कारी ही रहने दिया है | इसी अवस्था में हम कल्पनाओं में सपनों का महल खड़ा कर देते हैं | हमारी जरूरत क्या है ? हमें क्या चाहिए ? हमें क्या पाना है ? और हमारा उदेश्य क्या है ? देश को आजाद हुए ६० साल से ज्यादा समय हो गया है | फिर सामाजिक संरचना के ढाँचें की बदोलत से समाज विकास की ओर न जाकर, सामजिक उन्मूलन की ओर प्रस्थान कर रहा हैं | समाज में फैले अराजकतावादी विचारों को बढ़ावा जातिवाद के सभ्य भूत से ही सभानता के साथ प्राप्त होता हैं | जिनको प्रबुद्ध एवं सभ्य लोग गतिमान प्रदान करते रहते हैं |

आज-कल गांधी विचारधारा को जोर-शोर से अपनाने की गतिविधियाँ को बैशाखियों का सहारा अवश्य मिल रहा हैं | एक प्रकार से गांधीजी के विचारों को मोडिफाइड करने का तुत उभारा जा रहा है | यूँ कहे तो गलत नहीं होगा कि ‘पूरानी बोतल में नया दारू’ भरने की प्रक्रिया गतिमान हो गई है | जिसके चलते राजकीय रोटियाँ सेकी जा सकती है | हिन्दी साहित्य के समाज सुधारक कवि ‘कबीर’ भी कहते है कि- “ नाये, धोये क्या भया, मन का मैल न जाय | मीन सदा जल में रहे फिर बाँस क्यों न जाय |” कबीरदास की उक्त पंक्तियों को चरितार्थ करने की प्रतियोगिता आज लगती दृष्टिपात होती है | दो रंगी दुनिया के मुखौटे अलग-अलग है | कभी दिखाते, तो कभी छिपाते है | क्योंकि गांधीजी ने कभी उच्च-नीच के भेदभाव को मान्यता नहीं दी थी | तो फिर गांधियन मुखौटे को पहनकर चिड़ियाँ दो रंगी गान क्यों कर रही हैं ? गांधीजी ने कभी शिक्षा के व्यापारीकरण को बढ़ावा नहीं दिया था | फिर भी आज-कल गाँधी के नाम पर अपने शिक्षा के अड्डे चलाये जाते है | वहीँ लोग गांधीजी के आदर्शो की दुहाई देते हुए, शिक्षा के व्यापारी नर पंगुओं को पैदा कर रहे हैं | भारत आज भी अपनी विशेष पहचान बनाने में असफल रहा है | अंग्रेजों को देश निकाल मिले कई साल हो गए, लेकिन आज भी लोग अंग्रेजों की जूठन चाटने में गौरवान्वित हो रहे हैं | क्या हमारे देश की अस्मिता की पहचान अपनी भाषा में संभव नहीं है ? किन्तु देशवाशियों को अंग्रेजी ने भी गुलाम बना दिया हैं | जिनकी जड़ों को काटना यानी जूठन की प्रवृति से आझाद होना है | जो भारतीय अंग्रेजों को स्वीकार्य नहीं है | विश्व के विविध देशों ने उनकी खुद की भाषा में विकास किया हैं, नहीं के अंग्रेजी में | लेकिन हम अंग्रेजों के जूठन को चाटने में ही विवश है | ख़ैर देश की अस्मिता पहचान की समझ तक हम नष्ट हो गए होंगे |

प्रस्तुत अंक में समाविष्ट साक्षरों की साधनामय प्रतिफलिता को स्वीकार करते हुए, सहर्ष को अनुभव कर रहे है | उक्त अंक में सम्मिलित विभिन्न क्षेत्रों के विविध लेखों के जरिए, ज्ञान के विस्तृत दृष्टिकोण को समर्थता प्रदान की हैं | आने वालें अंकों में आप अपनी विद्वता को प्रगट करते रहेंगे | क्योंकि दुनिया वहीँ बदल सकता है, जिन्हें अपनी सुरक्षा का डर नहीं |

धन्यवाद.....................
जय हिन्दी..................................                                          
                                                                                                        
भरत. वी. भेडा 
D. K. V. Arts and Sc. College, Jamnagar
Mo. 09924646501